बिना गणेश पूजा के शुभ संकल्पों की पूर्ति संभव नहीं हो सकती

इन्दौर । भगवान गणेश प्रथम वंदनीय हैं। विघ्नहर्ता के रूप में देवता भी उन्हें मान्यता देते हैं। बिना गणेशजी की पूजा-आराधना के किसी शुभ संकल्प की पूर्ति नहीं हो सकती। गणेश सबसे सहज और सरल देवता है। शिव और पार्वती के पुत्र तो वे हैं ही, भारतीय समाज के जन-जन में भी स्थापित हैं। देश में जितने मंदिर राम और कृष्ण के हैं, उससे भी अधिक गणेशजी के भी हैं।
नमः शिवाय मिशन ट्रस्ट शिवकोठी ओंकारेश्वर के संस्थापक एवं एक रोटी बाबाजी के नाम से प्रख्यात स्वामी शिवोहम भारती महाराज ने आज गीता भवन सत्संग सभागृह में आंखों पर पट्टी बांधकर शिवपुराण की कथा में शिव-पार्वती विवाह के बाद के प्रसंगों, विशेषकर, गणेश महिमा सुनाते हुए उक्त विचार व्यक्त किए। महाराजश्री के सान्निध्य में यहां 24 सितंबर तक सुबह 10 बजे से दिवंगत पितरों के मोक्ष का अनुष्ठान तथा दोपहर 2 से सांय 6.30 बजे तक शिव पुराण कथा का संगीतमय अनुष्ठान चल रहा है। कथा शुभारंभ के पूर्व समाजसेवी बालकृष्ण छावछरिया, विष्णु बिंदल,दिनेश गुप्ता, महेश गुप्ता, मोहन मोदी, राजेंद्र गर्ग, त्रिपुरारीलाल शर्मा, मांगीलाल झंवर आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया। आरती के पूर्व अतिथियों द्वारा महाराजश्री की आंखों पर बंधी पट्टी खोली गई तो भक्तों ने करतल ध्वनि से स्वागत किया। संचालन त्रिपुरारीलाल शर्मा ने किया और आभार माना महेश गुप्ता ने।
स्वामी शिवोहम भारती ने शिव पार्वती विवाह के बाद के प्रसंगों का मनोहारी चित्रण करते हुए कहा कि पिता और पुत्री के संबंध अत्यंत भावना प्रधान होते हैं। बेटी तीन वंशों को तारती है। पति, पिता और माता के वंश का तारण पतिव्रता स्त्री करती है। पिता के भाव को सबसे पहले बेटी ही पढ़ती है, बेटे के संबंध तो स्वार्थ के होते हैं। माता और पिता का स्थान तीर्थ से भी अधिक वंदनीय होता है। गणेशजी ज्ञान और बुद्धि के साथ विवेक के भी देवता हैं। सच्चे मन से की गई उनकी आराधना कभी निष्फल नहीं होती।
