यूपी पंचायत चुनाव को न मानिए विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल, जानिए क्यों?

लखनऊ. यूपी में पंचायत चुनाव (UP Panchayat Election) की दुदुंभी बज चुकी है. वैसे तो राजनीतिक दलों का इससे कोई खास वास्ता नहीं रहता है लेकिन, जिला पंचायत अध्यक्ष की एक सीट ऐसी होती है जिस पर दलों की निगाहें रहती हैं. खासकर उस हलके के सांसद या विधायक की तो नज़र जरूर रहती है. वैसे तो राजनीतिक दल इससे दूर ही रहते हैं लेकिन, इस बार कुछ पार्टियों के तेवर बदले नजर आ रहे हैं. वो इसलिए क्योंकि उन्हें ये दिखाना है कि उनकी जड़ें यूपी में कितनी मजबूत हैं?

आम आदमी पार्टी इसीलिए पंचायत चुनावों में कूद गई है. पार्टी ने तो बकायदा अपने प्रत्याशियों की सूची जारी करने का निर्णय लिया है. दूसरी पार्टियों ने भले ही ऐसा एलान न किया हो लेकिन, इस बीमारी के शिकार सभी हैं. दूसरी पार्टियों ने कैंडीडेट घोषित भले ही न किए हों लेकिन, सैकड़ों की संख्या में सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरें मिल जायेंगी, जिसमें ग्राम प्रधान से लेकर वार्ड सदस्य तक के प्रत्याशियों ने बड़े-बड़े नेताओं की फोटो अपने पोस्टर में लगा रखी है.

किसी भी पद पर पार्टियों के सिंबल पर नहीं होते चुनाव

इनके इस अतिउत्साह का आलम तब है, जब पंचायत चुनावों में किसी भी पद पर राजनीतिक दलों के सिंबल पर चुनाव नहीं होते हैं. पार्टियां समर्थित कैण्डिडेट के तौर पर अपने लोग उतारती हैं. असल में अगले साल विधानसभा के चुनाव हैं. ऐसे में पंचायत चुनावों में ताल इसलिए ठोंका जा रहा है, जिससे ये बताया जा सके कि विधानसभा के चुनाव से पहले हमारा भी जनाधार है. हालांकि जानकार पूरी तरह इसे नहीं मानते हैं. उनका मानना है कि किसी भी सूरत में पंचायत चुनाव के नतीजों को विधानसभा के सेमीफाइनल के तौर पर नहीं देखा जा सकता है.
क्या है जानकारों की राय

वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी कहते हैं कि पंचायत के चुनाव थोड़ी-बहुत नब्ज़ को टटोलने जैसे हैं. विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल का हल्का-फुल्का अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है. इन चुनावों में अपना राग छेड़ने से वैसी पार्टियों को फायदा मिल जाता है, जिन्हें ग्रामीण स्तर पर अपनी पहुंच बनानी होती है.

वरिष्ठ पत्रकार बृज खण्डेलवाल कहते हैं कि गांवों की राजनीति में पार्टियों का घुसना लाजिमी है. देश में इस समय कुल 167 योजनायें चल रही हैं. इनमें से 100 के करीब ग्रामीण इलाकों के लिए हैं. पंचायतों में इतना पैसा आ गया है कि राजनीतिक पार्टियां इसे नजरअंदाज कर ही नहीं सकती हैं. पंचायत चुनावों के नतीजे भले ही आने वाले विधानसभा चुनाव की झांकी न हों लेकिन, पार्टियों की नजरों से ये ओझल नहीं हैं. निगाह सबकी है.

दूसरी तरफ वरिष्ठ पत्रकार सुनीता ऐरन ने कहा कि किसी भी सूरत में पंचायत चुनाव के नतीजे विधानसभा चुनाव का रिफ्लेक्शन नहीं हो सकते. दोनों अलग मुद्दों पर लड़े जाते हैं. विधानसभा के चुनाव में प्रदेश स्तर के मुद्दे होते हैं जबकि पंचायत चुनाव में बिल्कुल स्थानीय इश्यू. ऐसे में दोनों की कोई तुलना ही नहीं हो सकती.

खैर, जानकार जो भी मानें लेकिन, इतना तो तय है कि पंचायत चुनावों के नतीजे आने पर सभी पार्टियों में इस बात की होड़ मच जायेगी कि किसके कितने ज्यादा कैण्डिडेट जीते. विपक्ष कहेगा कि सत्ता पक्ष गायब और सत्ता पक्ष कहेगा कि लोकप्रियता बरकरार.

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