52 किलो सोना-11 करोड़ कैश केस में सौरभ शर्मा को बड़ी कानूनी राहत

जबलपुर| मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी की एकलपीठ ने राजधानी भोपाल के जंगल से 52 किलोग्राम सोना और 11 करोड़ रुपये नकद बरामद होने से जुड़े अत्यंत चर्चित और सनसनीखेज मामले में आरोपी परिवहन विभाग के पूर्व आरक्षक सौरभ शर्मा को औपचारिक रूप से जमानत प्रदान कर दी है। अदालत ने उनकी जमानत याचिका को मंजूर करते हुए उन्हें 10 लाख रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की स्थानीय जमानत पर जेल से रिहा किए जाने के निर्देश जारी कर दिए हैं।
करीब 18 महीने बाद जेल से बाहर आने का रास्ता साफ
उल्लेखनीय है कि आरोपी सौरभ शर्मा पिछले साल 10 फरवरी, 2025 से लगातार न्यायिक हिरासत के तहत जेल में बंद थे। अब लगभग 18 महीने की लंबी अवधि जेल में बिताने के बाद उनके कानूनी रूप से बाहर आने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि उनके खिलाफ चल रही अन्य आपराधिक और कानूनी कार्रवाई पहले की तरह नियमित रूप से जारी रहेगी।
जांच पूरी और आरोप तय होने को बनाया गया आधार
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य रखा गया कि इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की विस्तृत जांच अब पूरी हो चुकी है और सक्षम अदालत में चार्जशीट (आरोप पत्र) भी दाखिल की जा चुकी है। इसके अलावा, ट्रायल कोर्ट द्वारा इस मामले में आरोपियों पर आरोप (चार्ज) भी तय किए जा चुके हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने माना कि अब आगे की जांच के लिए सौरभ शर्मा को और अधिक समय तक हिरासत में रखने की कोई आवश्यकता नहीं है।
इसके साथ ही, कोर्ट ने इस कानूनी बिंदु पर भी विशेष गौर किया कि इस मामले में दर्ज अपराध के तहत अधिकतम सात वर्ष तक की सजा का प्रावधान है, जिसके मुकाबले आरोपी सौरभ पहले ही लगभग डेढ़ साल (18 महीने) की सजा जेल में काट चुके हैं। इसके अतिरिक्त, निकट भविष्य में इस पूरे मुकदमे का ट्रायल पूरा होने की संभावना न के बराबर होने को भी जमानत दिए जाने के पक्ष में एक प्रमुख और ठोस आधार माना गया।
हाई कोर्ट द्वारा लगाई गई सख्त शर्तें
हाई कोर्ट ने जमानत की मंजूरी देते हुए आरोपी के लिए कुछ स्पष्ट और कड़ी शर्तें भी तय की हैं:
सौरभ शर्मा अदालत की पूर्व अनुमति के बिना देश छोड़कर बाहर नहीं जा सकेंगे।
वे मुकदमे से जुड़े किसी भी गवाह को किसी भी प्रकार से प्रभावित करने की कोशिश नहीं करेंगे।
वे मामले के साक्ष्यों (सबूतों) के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं कर सकेंगे।
उन्हें निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) में हर तारीख और सुनवाई पर नियमित रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी।
