विज्ञान या चमत्कारः महज एक रात में कैसे बने ये 7 भव्य मंदिर, रह जाएंगे दंग

घर और मंदिर बनाना एक दिन का काम नहीं होता। इन्हें बनाने में कई महीने और वर्ष लग जाते हैं। ऐसे में शायद यह किसी के लिए भी यकीन करना मुश्किल हो सकता है कि एक रात में ये 7 मंदिर कैसे बन गए। अब आप यकीन करें या ना करें ये आप पर है लेकिन जो कथाएं और बातें सामने हैं उससे तो यही मालूम होत है कि भारत में मौजूद 7 प्राचीन मंदिरों का निर्माण महज 1 ही रात में हो हुआ है। आइए देखें एक रात में बनने वाले 7 मंदिर कौन-कौन से हैं और इनके पीछे क्या रहस्य है।

बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित है एक प्राचीन सूर्य मंदिर। इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने एक रात में किया था। इस मंदिर के बारे में एक और रोचक तथ्य यह है कि यह शायद देश का एकमात्र ऐसा सूर्य मंदिर है, जिसका मुख्य दरवाजा पश्चिम दिशा में है। मंदिर परिसर में स्थित एक शिलालेख से पता चलता है कि इसका निर्माण त्रेता युग में पुरुरवा ऐल ने स्वयं भगवान विश्वकर्मा से कराया है।

कान्हा की यादों में रचा-बसा है वृंदावन। यहां स्थित गोविंद देवजी मंदिर के बारे में कहा जाता है इस मंदिर का निर्माण भी श्रीकृष्ण की लीला ही है। ध्यान से देखने पर इस मंदिर की कलाकारी कुछ अधूरी-सी लगता है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण एक रात में दैवीय शक्तियों ने किया है, सूर्योदय से पहले ही किसी ने चक्की पीसना शुरू कर दिया, क्योंकि सांसारिक गतिविधियों के बीच दैवीय शक्तियां नहीं रह सकती थीं, इसलिए वह इस कलाकारी को अधूरा छोड़कर ही चली गईं।

उत्तर प्रदेश के मेरठ मंडल स्थित सिंभौली गांव में एक मंदिर है। स्थानीय लोगों के बीच इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण एक रात में भूतों ने किया है, इसलिए इसे ‘भूतों वाला मंदिर’ भी कहा जाता है। यह मंदिर पूरी तरह लाल ईंटों से बना है और खास बात यह है कि इन ईंटों को जोड़ने में किसी तरह के सीमेंट या चूने का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इस मंदिर के शिखर पर थोड़ी-सी काई लगी है, बाकी कहीं कोई परिवर्तन या टूट-फूट नहीं है। लोगों का कहना है कि इस मंदिर के शिखर पर काई इसलिए लगी है क्योंकि जब शिखर बनाने का नंबर आया तब तक सूर्योदय हो गया और भूत चले गए। मंदिर के अधूरे शिखर को इंसानों ने पूरा किया, इसलिए इसके शिखर पर काई लगी है या पहले दरार आई थी। बाकी किसी हिस्से में कोई नुकसान नहीं है। जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस मंदिर का निर्माण तीसरी शताब्दी में हुआ लगता है।

झारखंड के देवघर स्थित पार्वती मंदिर के बारे में कहा जा है कि इस मंदिर को भी भगवान विश्वकर्मा ने एक रात में बनाया है। इस मंदिर के प्रांगण में देवी पार्वती, भगवान बैजनाथ और विष्णु भगवान का मंदिर है। इस प्रांगण में माता पार्वती के मंदिर की छत नहीं होने की वजह बताई जाती है कि एक मुर्गे की बाग सुनकर दैवीय शक्तियां अपने लोक को वापस चली गईं। जबकि मुर्गे ने माता पार्वती की प्रेरणा से समय से पहले बाग दी थी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि माता नहीं चाहती थीं कि उनका मंदिर भोले बाबा के मंदिर से बड़ा बने। इस मंदिर में एक ही दरवाजा है, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी आज के इंजिनियर्स दूसरा दरवाजा लगाने में नाकाम रहे हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर की बनावट ही कुछ ऐसी है कि ऐसा करना संभव नहीं हो पाता।

मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में स्थित है ककनमठ शिव मंदिर। इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि बड़े-बड़े पत्थरों से बने इस मंदिर के निर्माण में किसी भी तरह के सीमेंट का प्रयोग नहीं किया गया है। फिर भी यह मंदिर सदियों से आंधी-तूफान का सामना करते हुए सीना ताने खड़ा है। इस मंदिर का निर्माण कच्छवाहा वंश के राजा कीर्ति सिंह के शासनकाल में हुआ था। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भगवान शिव के गणों और भूतों ने किया था।

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में एक हथिया देवाल मंदिर है। इस मंदिर को शापित मंदिर माना जाता है और इसमें पूजा-अर्चना भी नहीं होती है। कहते हैं कि इस मंदिर को एक हाथवाले शिल्पकार ने एक ही रात में बना दिया था। लेकिन भूल यह हो गई कि शिवलिंग का अर्घा दक्षिण दिशा में स्थापित हो गया, जिसे पूजा के लिए उचित नहीं माना जाता। इस शिल्पकार के बारे में कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं।

मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित है भोजेश्वर मंदिर। इस मंदिर को उत्तर भारत का सोमनाथ मंदिर भी कहा जाता है। इस मंदिर को लेकर कई तरह की कहानियां और मान्यताएं है। इन्हीं में से एक है कि इस मंदिर का संबंध द्वापर युग और पांडवों से है। पांडवों ने ही अपनी माता कुंती के लिए यह प्रार्थना स्थल और शिव मंदिर बनाया था और रातोंरात इस विशाल शिवलिंग की स्थापना की थी। यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है।


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