हमें वो बांट के फ़िरक़ों में जीत जाता है, वरना वो कभी हमको हरा नहीं सकता

इंदौर। मोहब्बत,जज्बात के अल्फ़ाज़ की खुशबू फ़िज़ा में बिखर रही थी। मुशायरे में उम्दा शेर सुनकर श्रोता वाह-वाह करते रहे। खरगोन, बुरहानपुर, देवास, उज्जैन, बड़नगर और इंदौर के शायरों ने उम्दा कलाम से ख़ूब समां बांधा। 
धार रोड़ स्थित सिरपुर तालाब पर हज़रत दावलशाह वली दरगाह ग्राउंड पर देर रात तक मुशायरे की महफ़िल सजी। सूफी बुज़ुर्ग हजरत दावल शाह वली के सालाना उर्स के मौके पर मुशायरे में बुराहनपुर के शायर डॉ. जलीलुलरेहमान, अफ़ज़ाल दानिश, उज्जैन से ज़िया राना, हुसैन अहमद शान, इक़बाल परवाज़ी, सिराज अहमद सिराज, देवास से अज़ीम देवासी, बड़नगर से शमशाद ज़ख़्मी ने उम्दा कलाम सुनाए। इंदौर से शायर अज़ीज़ अंसारी, फरियाद बहादुर, हनीफ दानिश, शरीफ कैफ, साबिर सहबा, ज़हीर राज़, नवाब हनफ़ी, सरफ़राज़ नूर, रामदास माहोरे और संदीप साहिल की शायरी भी सुनने को मिली। 
सभी शायरों का इस्तक़बाल हाजी सोहराब पटेल और सादिक़ पटेल ने किया। मुशायरे का आगाज बुरहानपुर के शायर अफ़ज़ाल दानिश ने नातिया कलाम से बखूबी किया। उन्होंने सुनाया – मुस्कुराया आपने तो मुस्कुराई कायनात, आपसे फूलों ने सीखा मुस्कुराना या नबी। शायर शरीफ कैफ़ ने न सिर्फ उम्दा सुनाया बल्कि मुशायरे को संभाला भी। शायर शरीफ कैफ ने शायरी के ज़रिए इत्तेहाद के साथ रहने का पैग़ाम दिया – ये चार दिन का अंधेरा डरा नहीं सकता, नसीब का वो उजाला चुरा नहीं सकता, हमें वो बांट के फ़िरक़ों में जीत जाता है, वरना वो कभी हमको हरा नहीं सकता।
ख़ानदानी रिवायत को आगे बढाने वाले शायर सरफ़राज़ नूर के गले से मानों रोशनी निकल रही थी,उनका यक़ीन पुख़्तगी लिए हुए था,उन्होंने सुनाया – ख़बर चारों जानिब से नुकसान की है, ये ख़ामी चमन के निगेहबान की है। उर्दू ज़बान से अमली मोहब्बत रखने वाले शायर नवाब हनफ़ी ने बगैर जुमलेबाज़ी के मेयारी अशआर सुनाए,उनका ये शेर बेपनाह दाद बटोरने में कामयाब रहा, देखिए ये शेर – हम हैं के पिछली सफ़ के भी लायक़ नहीं रहे, भेजा था उसने हमको इमामत के वास्ते।
अज़ीम देवासी उम्दा तरन्नुम के साथ सलीके से सुना गए ,मुलाहिज़ा फरमाएं उनका ये शेर – गुल हो नायाब तो गुलदान भी आ जाते हैं, झोपड़ी में कभी सुल्तान भी आ जाते हैं।
मुशायरे की निज़ामत की ज़िम्मेदारी खरगोन के शायर क़यामउद्दीन क़याम के पास थी।जिन्होंने सामईन के मिजाज़ को भांपते हुए उम्दा अशआर के साथ सभी को बांधे रखा और उम्दा कलाम सुनाते हुए महफ़िल को ऊंचाई पर पहुंचाया – जज़ा इसारो क़ुर्बानी,मोहब्बत कम वफादारी, ये सब ज़ेवर मेरे किरदार से उतरे, इसी उम्मीद में दामन को हम फैलाये बैठे हैं, न जाने कब कोई आंसू तेरे रुख़सार से उतरे, ग़रीबी थी तो सब अपने नज़रअंदाज़ करते थे, गले हमको लगाया जब चमकती कार से उतरे।

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