42 साल पुराना सियासी समीकरण बदला, सातारा जिला बैंक चुनाव में शंभूराज देसाई जीते

सातारा। महाराष्ट्र के सहकारिता क्षेत्र में अत्यधिक महत्वपूर्ण माने जाने वाले सातारा जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के हालिया चुनाव परिणामों ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल पैदा कर दी है। जिले के हाई-प्रोफाइल पाटण सोसायटी निर्वाचन क्षेत्र में राज्य सरकार के मंत्री और जिले के पालक मंत्री शंभूराज देसाई ने अपने कड़े मुकाबले में विजय हासिल की है। उन्होंने अपने पारंपरिक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता सत्यजीतसिंह पाटणकर को पराजित करके यह बड़ी कामयाबी हासिल की। बेहद दिलचस्प और कशमकश भरे इस चुनावी मुकाबले में शंभूराज देसाई को कुल 58 मत प्राप्त हुए, जबकि उनके विरोधी सत्यजीतसिंह पाटणकर को 46 वोटों से ही संतोष करना पड़ा।

शिवसेना के लिए अहम जीत और 42 वर्षों बाद देसाई गुट की वापसी

यह चुनावी परिणाम एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के लिए बेहद अहम और रणनीतिक जीत माना जा रहा है। लगभग बयालीस वर्षों के लंबे अंतराल के पश्चात पाटण क्षेत्र से जिला सहकारी बैंक के संचालक पद पर देसाई परिवार या देसाई गुट की ऐतिहासिक वापसी दर्ज की गई है। चुनाव परिणाम की आधिकारिक घोषणा होते ही देसाई समर्थकों में भारी उत्साह देखा गया और उन्होंने जमकर जश्न मनाया। इस महत्वपूर्ण चुनावी अभियान और जीत का ताना-बाना बुनने में शंभूराज देसाई के पुत्र यशराज देसाई की भी बेहद सक्रिय और निर्णायक भूमिका मानी जा रही है।

सांगली जिला बैंक में पूर्व सांसद की एक वोट से नाटकीय जीत

दूसरी ओर, सांगली जिला सहकारी बैंक के चुनाव से भी एक बेहद चौंकाने वाला परिणाम सामने आया है। यहाँ के तासगांव सोसायटी निर्वाचन क्षेत्र से पूर्व सांसद संजय काका पाटील ने महज एक वोट के मामूली अंतर से जीत दर्ज की। उन्होंने एक कड़े मुकाबले में पूर्व विधायक सुमन ताई पाटील को पराजित किया। उल्लेखनीय है कि सुमन ताई पाटील महाराष्ट्र के दिवंगत दिग्गज नेता और पूर्व गृह मंत्री आर. आर. पाटिल की धर्मपत्नी हैं, जिनकी हार को क्षेत्र में एक बड़े राजनीतिक उलटफेर के रूप में देखा जा रहा है।

पाटण की राजनीति में बदला वर्षों पुराना समीकरण

पाटण तालुका में भले ही शंभूराज देसाई का राजनीतिक जनाधार हमेशा मजबूत रहा हो, परंतु जिला सहकारी बैंक के भीतर अब तक पाटणकर गुट का ही एकछत्र दबदबा कायम माना जाता था। इस बार शंभूराज देसाई ने दशकों पुराने उस पारंपरिक समीकरण को पूरी तरह से ध्वस्त करते हुए बैंक के संचालक पद पर अपना कब्जा जमाया है। करीब 42 से 45 वर्षों बाद देसाई गुट की इस धमाकेदार वापसी को स्थानीय सहकारिता और क्षेत्रीय राजनीति के दृष्टिकोण से काफी दूरगामी असर वाला माना जा रहा है। इससे पूर्व भी जिला परिषद चुनावों के दौरान इन दोनों गुटों के बीच जोरदार राजनीतिक संघर्ष देखा गया था, लेकिन इस ताजा जीत ने स्थानीय राजनीति में शंभूराज देसाई के प्रभाव और कद को और अधिक मजबूती प्रदान की है।

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