सिख विरोधी दंगे: फांसी की सजा पाने वाला पहुंचा दिल्ली हाईकोर्ट, सुनवाई 19 को

नई दिल्ली । १९८४ में सिख विरोधी दंगे के दौरान त्रिलोकपुरी में ९५ लोगों की हत्या समेत घरों में आगजनी के मामले में फांसी की सजा पाने वाले यशपाल सिंह ने इसके खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की है। वहीं, कोर्ट ने मामले की सुनवाई के लिए राजी हो गया है, इसके लिए १९ दिसंबर की तारीख तय की है। पिछले महीने की २८ नवंबर को १९८४ में सिख विरोधी दंगे के दौरान त्रिलोकपुरी में ९५ लोगों की हत्या समेत घरों में आगजनी के मामले में हाईकोर्ट ने २२ साल बाद फैसला सुनाया था। न्यायमूर्ति आरके गॉबा की पीठ ने निचली अदालत से सभी ८८ दोषियों को मिली ५ साल की सजा को बरकरार रखा था। पीठ ने सभी को दंगा फैलाने, घरों को जलाने और कफ्र्यू के नियमों का उल्लंघन करने का दोषी पाया था। वहीं, पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अजय पांडे ने दोषी यशपाल सिंह को फांसी और नरेश सहरावत को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। सभी दोषियों को तत्काल कल्याणपुरी थाने में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। मामले के २३ अभियुक्तों ने कड़कड़डूमा कोर्ट द्वारा २७ अगस्त १९९६ को सुनाए गए फैसले को चुनौती दी थी। कई दोषियों की अपील लंबित होने के दौरान मृत्यु भी हो चुकी है, वर्तमान में ८८ दोषियों में से सिर्फ ४७ ही जीवित हैं। वकीलों, पीड़ितों और मीडियाकर्मियों से खचाखच भरे कोर्ट रूम में बुधवार को न्यायमूर्ति आर.के.गॉबा ने इस मामले में दिल्ली पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। इस मामले की सुनवाई में हुई दो दशक से अधिक समय की देरी को लेकर देश की न्याय प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक दंगों के ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का गठन किया जाना चाहिए, साथ ही सामान्य आपराधिक न्याय प्रक्रिया के नियमों में भी समुचित सुधार किया जाना चाहिए। निचली अदालत के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट पहुंचे २३ अभियुक्तों की याचिका पर २२ साल तक चली सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने विगत सितंबर में फैसला सुरक्षित रख लिया था।
१९८४ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगे में त्रिलोकपुरी इलाके के लोग भी शिकार हुए थे। मामले में दर्ज रिपोर्ट के अनुसार २ नवंबर १९८४ को यहां हुए दंगे में ९५ लोगों की मौत हुई थी और १०० घर जला दिए गए थे। घटना के बाद दंगा, आगजनी और कफ्र्यू के उल्लंघन की धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की गई थी और १०७ लोगों को आरोपित बनाया गया था। मामले में लंबी सुनवाई के बाद कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एस.एल.ढींगरा ने ८८ लोगों को ५ साल की सजा सुनाई थी और ५००० का जुर्माना लगाया था।
सिख विरोधी दंगों से जुड़े दिल्ली के महिपालपुर में हुए दोहरे हत्याकांड में विगत २० नवंबर को पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अजय पांडे ने दोषी यशपाल सिंह को फांसी और नरेश सहरावत को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। न्यायमूर्ति आरके गॉबा दिल्ली हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी और कहा था, वारदात को ३४ साल हो चुके हैं और पीड़ित अब भी न्याय के इंतजार में हैं, क्या यही प्रभावशाली न्याय प्रणाली है? क्या हमारी न्याय प्रणाली में इतने बड़े पैमाने पर हुए आपराधिक मुकदमे की सुनवाई करने की यह उपयुक्त व्यवस्था है? क्या हमने आपराधिक न्याय प्रक्रिया के इस खराब अनुभव से कुछ सीखा है? न्यायपालिका के अब तक के इतिहास में आपराधिक न्याय प्रक्रिया का यह एक ऐसा मामला है, जिसे फिर से कभी नहीं दोहराया जाना चाहिए। वहीं, एचएस फूलका लोक अभियोजक ने कहा था कि यह बड़ा फैसला है। न सिर्फ ८८ दोषियों की सजा को बरकरार रखा गया है, बल्कि दंगों से कैसे निपटा जाए, इसपर भी निर्देश दिया गया है। इस फैसले से देश में इस तरीके की घटनाओं पर रोक लगेगी।
