विश्व धर्म कि आधार शिला अहिंसा – आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज  

भोपाल। आज पर्वराज पर्युषण की समापन बेला अंनत चतुर्दर्शी के अवसर पर अशोका गार्डन जैन मंदिर कमेटी भोपाल द्वारा सुबह 11:00 बजे आचार्य गूरूवर 108 श्री आर्जव सागर जी महाराज के मंगल सानिध्य में श्रीजी की परम्परागत शोभायात्रा निकाली गई। प्रवक्ता अंकित जैन ने बताया कि शोभायात्रा में इस बार विशेष रूप से 31 धर्मध्वजाएं, श्रवण उपासक युवा संध दिव्य धोष, पंजाबी ढोल ,बेंड बाजो के साथ विशेष रूप से श्री जी की भव्य चांदी से निर्मित पालकी थी। शोभायात्रा अशोका गार्डन के प्रमुख मार्गों से होते हुए मन्दिर पहुँची। शोभायात्रा में पुरुष श्वेतवस्त्र एवं महिलाएं केसरिया वस्त्र धारण करके श्री जी के जुलूस में शामिल हुए। शोभा यात्रा अशोका गार्डन जैन मंदिर, पहुंचने के उपरांत  श्रीजी का महामस्तकाभिषेक हुआ एवं आचार्य श्री के अमृत वचनों का सभी श्रद्धालुओं ने अमृतपान किया।
आज आचार्य श्री  ने बताया कि संसार के धर्म नाम से कहे जाने वाले जितने भी संप्रदाय हैं उन सभी में अहिंसा कि प्रमुखता है जिस दृष्टि या अपेक्षा से सभी धर्मो में समानता ठहरती है।  उन्होंने इन पंक्तियों को मार्मिक तरह से बताते हुए कहा कि अहिंसा को विभिन्न नामों से पुकारा जाता है जैसे दया अनुकंपा ,अभयदान ,वात्सल्य ,करूणा रहम ,परोपकार और जीव रक्षण इत्यादी। इन उपर्युक्त शब्दों में ब्राह्म शाब्दिक दृष्टि से कुछ भेद होते हुए भी सभी का अन्तरंग समान है। सभी का भाव जीवों को कष्ट से वचाकर सुख प्रदान करना है अहिंसा धर्म का प्राण है। जैसे प्राण के विना प्राणी का जीवन नहीं ,नीव के बिना इमारत नहीं, और जड़ के बिना वृक्ष नहीं ठहर सकता वेसै ही अहिंसा, दया के बिना धर्म रूपी महल या वृक्ष नहीं ठहर सकता अतः आचार्य की ,महापुरुषों की उद्धोषपूर्ण वाणी है कि-
""धर्मस्य मूलं दया धम्मो दया विशुद्धो ।।
उन्होंने बताते हुए कहा कि दया धर्म का मूल है। धर्म दया से विशुद्ध है अतएव जहाँ अहिंसा या दया नहीं वहाँ धर्म की शुरूआत ही नहीं अहिंसा के बिना धर्म का कथन कागज पुष्प के समान धर्म शब्द की नकल मात्र है। इसलिए कहा भी गया है कि जिस आत्मा के जीवन में संयम होता है वह अपनी शक्ति का प्रयोग ध्यान योग और जन कल्याण में अच्छी तरह कर सकता है और वही अहिंसा के मार्ग पर अपना कल्याण कर सकता है।

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