सज्जनगढ़ अभ्यारण्य को प्लास्टिक मुक्त बनाने की बड़ी कवायद: शुरू हुआ पायलट प्रोजेक्ट, वाहनों की जांच के साथ लगेगा भारी जुर्माना

उदयपुर | विश्व पर्यावरण दिवस के खास मौके पर झीलों की नगरी उदयपुर के मशहूर सज्जनगढ़ वन्यजीव अभयारण्य में पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक बड़ी और सराहनीय शुरुआत की गई है। शुक्रवार से इस पूरी सेंचुरी और बायोलॉजिकल पार्क क्षेत्र में प्लास्टिक की पानी की बोतलों के ले जाने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। पूरे अभयारण्य क्षेत्र को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए वन विभाग ने एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है, ताकि जंगल में फैलने वाले प्लास्टिक कचरे को रोका जा सके और वहां के प्राकृतिक वातावरण को सुरक्षित रखा जा सके।

कांच की बोतलों का विकल्प और रिफंड की सुविधा

सेंचुरी और बायो पार्क को प्लास्टिक फ्री जोन बनाने के साथ ही वन विभाग ने पर्यटकों की सुविधा का भी पूरा ध्यान रखा है। प्लास्टिक की बोतलों के विकल्प के रूप में एक स्टार्टअप कंपनी के साथ मिलकर नई व्यवस्था की गई है। अब पर्यटकों को अभयारण्य की पार्किंग और किले पर बने रेस्टोरेंट में कांच की बोतलों में पीने का पानी मिलेगा। इसके लिए पर्यटकों को एक बोतल के 50 रुपये देने होंगे, लेकिन खास बात यह है कि पानी पीने के बाद जब पर्यटक वह बोतल वापस जमा करेंगे, तो उन्हें 40 रुपये रिफंड (वापस) मिल जाएंगे। इस री-यूजेबल व्यवस्था से संसाधनों के दोबारा इस्तेमाल को बढ़ावा मिलेगा।

नियमों का उल्लंघन करने पर लगेगा ₹1,000 का जुर्माना

वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि शुरुआती कुछ दिनों तक यहां आने वाले सैलानियों को इस नए नियम के प्रति जागरूक और शिक्षित किया जाएगा, जिसके बाद इसे पूरी सख्ती से लागू किया जाएगा। अगर जागरूकता अवधि के बाद भी कोई पर्यटक अभयारण्य क्षेत्र के भीतर प्लास्टिक की पानी की बोतल ले जाता हुआ पकड़ा जाता है, तो उस पर ₹1,000 तक का आर्थिक जुर्माना लगाया जाएगा। इस नियम को कड़ाई से लागू करने के लिए सेंचुरी में आने वाले सभी निजी वाहनों और टैक्सियों की सघन चेकिंग की जाएगी। वन विभाग ने टैक्सी चालकों को भी निर्देश दिए हैं कि वे पर्यटकों को बैठने से पहले ही इस नियम की जानकारी दे दें।

वन्यजीवों की सुरक्षा और पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने का लक्ष्य

डीएफओ यादवेंद्र सिंह चूंडावत ने इस कदम के महत्व पर रोशनी डालते हुए बताया कि अक्सर सैलानी पानी पीने के बाद प्लास्टिक की खाली बोतलें जंगलों, रास्तों और ऐतिहासिक किले की दीवारों के पास फेंक देते हैं। इससे न केवल प्राकृतिक खूबसूरती प्रभावित होती है, बल्कि वहां रहने वाले वन्यजीवों की जान को भी खतरा बना रहता है और पूरे इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचता है। इस नई पहल से वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी। वन विभाग को उम्मीद है कि इस कदम से उदयपुर का प्राकृतिक सौंदर्य तो बचेगा ही, साथ ही पर्यटकों में भी पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का अहसास जगेगा। अगर यह पायलट प्रोजेक्ट कामयाब रहता है, तो इसे राज्य के अन्य संरक्षित वनों में भी लागू किया जा सकता है।

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