त्विषा की चोटों पर दो AIIMS की अलग राय, भोपाल ने बताया एंटी-मॉर्टम तो दिल्ली ने माना परिवहन के दौरान लगी

भोपाल। राजधानी के बहुचर्चित त्विषा शर्मा संदिग्ध मौत मामले में देश के दो शीर्ष चिकित्सा संस्थानों—एम्स भोपाल और एम्स दिल्ली—की मेडिकल रिपोर्टों में सामने आए गंभीर विरोधाभास ने जांच की दिशा और निष्पक्षता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। मृतका के परिजनों के अधिवक्ता अंकुर पांडे ने दोनों फॉरेंसिक बोर्ड्स द्वारा दी गई राय में आए अंतर पर कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सीबीआई (CBI) ने एम्स भोपाल के शुरुआती वैज्ञानिक निष्कर्षों को दरकिनार कर केवल एम्स दिल्ली की रिपोर्ट को अपनी जांच का आधार बनाया है।
शरीर की चोटों और संघर्ष के निशानों पर अलग-अलग राय
अधिवक्ता पांडे के अनुसार, यद्यपि दोनों ही संस्थानों ने मौत का प्राथमिक कारण फांसी (एस्फिक्सिया) स्वीकार किया है, लेकिन शरीर पर मिले घावों और चोटों की व्याख्या में भारी अंतर है:
एम्स भोपाल की रिपोर्ट: प्राथमिक जांच में भोपाल एम्स के बोर्ड ने बाएं हाथ, कलाई और उंगलियों पर मौजूद चोटों को 'एंटी-मॉर्टम' (मृत्यु से पूर्व की) बताया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि ये ताजा चोटें मौत से ठीक पहले किसी संघर्ष या हाथापाई का नतीजा हो सकती हैं। बोर्ड ने शव को फंदे से उतारने या ले जाने के दौरान ये चोटें लगने की संभावना को खारिज किया था।
एम्स दिल्ली की रिपोर्ट: इसके ठीक उलट, एम्स दिल्ली के फॉरेंसिक बोर्ड ने इन चोटों को 'इंसीडेंटल ट्रांसपोर्टेशन इंज्यूरी' (शव को ले जाने के दौरान लगी चोटें) करार दिया और घटना के समय किसी भी तरह के संघर्ष या हमले के दावों को नकार दिया।
परिजनों के वकील ने उठाए गंभीर कानूनी और फॉरेंसिक सवाल
परिजनों के अधिवक्ता ने सीबीआई जांच और एम्स दिल्ली की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए निम्नलिखित बिंदु रेखांकित किए हैं:
जांच का आधार: यह स्पष्ट होना चाहिए कि एम्स दिल्ली ने किस फॉरेंसिक आधार पर भोपाल एम्स के 'एंटी-मॉर्टम' चोटों के निष्कर्ष को खारिज किया और क्या दिल्ली बोर्ड ने शव का प्रत्यक्ष परीक्षण किया था या केवल तस्वीरों व कागजातों के आधार पर राय दी?
वैज्ञानिक स्पष्टीकरण की मांग: दो प्रतिष्ठित केंद्रीय मेडिकल बोर्ड्स के परस्पर विरोधी आकलनों में से एक को चुनने और दूसरे को पूरी तरह खारिज करने का ठोस और वैज्ञानिक कारण अदालत के समक्ष आना चाहिए।
अदालती कार्यवाही पर प्रभाव
अधिवक्ता का कहना है कि सीबीआई का अंतिम निष्कर्ष एम्स दिल्ली की थ्योरी पर आधारित है, जिसे अदालत भी विचार में ले रही है। परिजनों ने मांग की है कि जब तक दोनों रिपोर्टों के इस बड़े विरोधाभास का पारदर्शी और वैज्ञानिक समाधान नहीं निकाला जाता, तब तक निष्पक्ष न्याय संभव नहीं है।
