यमुना डूब क्षेत्र की 92 कॉलोनियों को बड़ी राहत, फिलहाल नहीं चलेगा बुलडोजर

नई दिल्ली। यमुना नदी के डूब क्षेत्र यानी ओ-जोन (O-Zone) के अंतर्गत बसी रिहायशी कॉलोनियों और गांवों के निवासियों को फिलहाल प्रशासन की बड़ी कार्रवाई से बड़ी राहत मिली है। क्षेत्र में संभावित ध्वस्तीकरण की बढ़ती आशंकाओं के बीच मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मंगलवार को दिल्ली सचिवालय में एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक बुलाई, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि इस डूब क्षेत्र में फिलहाल सरकारी बुलडोजर नहीं चलाया जाएगा। मुख्यमंत्री ने आश्वस्त किया कि ओ-जोन क्षेत्र के भीतर स्थित पुरानी आबादियों, पुश्तैनी गांवों और पूर्व में निर्मित हो चुके मकानों को किसी भी प्रकार से क्षतिग्रस्त नहीं किया जाएगा। दिल्ली सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि वह इन क्षेत्रों में जीवन-यापन करने वाले करीब 15 लाख नागरिकों के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए पूरी मजबूती के साथ खड़ी है।
अवैध घोषित करने वाले सरकारी बोर्डों से फैला भ्रम, 15 लाख आबादी पर था संकट
सचिवालय में आयोजित इस बैठक के दौरान प्रशासनिक अधिकारियों ने तकनीकी आंकड़े प्रस्तुत करते हुए बताया कि यमुना ओ-जोन के दायरे में इस समय लगभग 91 से 92 अनधिकृत (कच्ची) कॉलोनियां और तकरीबन एक दर्जन प्राचीन गांव बसे हुए हैं। इन रिहायशी इलाकों में पिछले कई दशकों से करीब 15 लाख की विशाल आबादी निवास कर रही है। बैठक में शामिल स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने पुरजोर तरीके से मुद्दा उठाया कि विभाग द्वारा क्षेत्र में जगह-जगह लगाए गए 'अवैध डूब क्षेत्र' के चेतावनी बोर्डों के कारण स्थानीय जनता के बीच भारी असमंजस, डर और दहशत का माहौल पैदा हो गया है, जिसे तुरंत दूर किया जाना बेहद आवश्यक है।
जोन बदलने की राजनीतिक उलझन और एफ-जोन से ओ-जोन का सफर
समीक्षा बैठक के समापन के बाद आयोजित एक संयुक्त पत्रकार वार्ता में सांसद रामवीर सिंह बिधूड़ी और मनोज तिवारी ने संयुक्त रूप से कहा कि केंद्र सरकार, स्थानीय प्रशासन और संगठन इस मानवीय विषय को लेकर बेहद गंभीर और संवेदनशील हैं। सांसदों ने ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए बताया कि इन विवादित कॉलोनियों को 24 मार्च 2008 को वैधानिक रूप से नियमित (पास) किया गया था और उस कालखंड के मास्टर प्लान के अनुसार ये सभी इलाके सुरक्षित 'एफ-जोन' के अंतर्गत आते थे। इसके पश्चात, 10 अगस्त 2010 को तत्कालीन सरकारों की नीतिगत कमियों के कारण इन आबादियों को अचानक ओ-जोन (डूब क्षेत्र) में स्थानांतरित कर दिया गया। हालांकि, वर्ष 2013 में दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने इन रिहायशी क्षेत्रों को दोबारा सुरक्षित 'एफ-जोन' में वापस लाने के लिए एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन भी जारी किया था, परंतु किन्हीं कारणों से इसकी अंतिम अधिसूचना (फाइनल नोटिफिकेशन) आज तक ठंडे बस्ते में पड़ी है।
उच्च न्यायालय की चिंता केवल नए निर्माणों पर, डीडीए से मांगा गया स्पष्टीकरण
सरकारी अभिलेखों और माननीय उच्च न्यायालय के हालिया दिशा-निर्देशों के गहन विश्लेषण से यह पूरी तरह साफ होता है कि अदालत की मुख्य चिंता यमुना नदी के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले नए और वर्तमान में चल रहे अवैध निर्माणों को रोकने को लेकर है, न कि वर्षों पुरानी स्थापित आबादियों को उजाड़ने की। जनप्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि कुछ भू-माफिया और असामाजिक तत्व डिमोलिशन के इसी खौफ का नाजायज फायदा उठाकर स्थानीय लोगों को डरा रहे हैं और उनकी आड़ में धड़ल्ले से नया अवैध निर्माण करवा रहे हैं। इस गंभीर स्थिति पर संज्ञान लेते हुए मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने डीडीए के शीर्ष अधिकारियों को फटकार लगाते हुए इस भ्रम पर लिखित स्पष्टीकरण मांगा है। उन्होंने कड़े लहजे में कहा कि जब हाईकोर्ट ने पुराने निर्माणों को हटाने के संबंध में कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की है, तो डीडीए को भी अदालत की मूल भावना का आदर करते हुए केवल नए और अवैध निर्माणों के खिलाफ ही अपनी दंडात्मक कार्रवाई केंद्रित रखनी चाहिए।
