भोपाल में जल संकट नहीं, जल गुणवत्ता पर संकट! पीने के पानी में मिले खतरनाक बैक्टीरिया

भोपाल| मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में नगर निगम की पेयजल वितरण व्यवस्था पर गंभीर और बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। हाल ही में सामने आई पानी की जांच रिपोर्ट ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है, जिसमें बड़े तालाब से शहर में सप्लाई होने वाले पीने के पानी के अधिकांश सैंपल पूरी तरह दूषित पाए गए हैं। जांच रिपोर्ट के मुताबिक, बड़े तालाब के लगभग 90 प्रतिशत पानी के नमूने पीने योग्य नहीं निकले। इसके अलावा, कोलार जल स्रोतों से आने वाले करीब 25 प्रतिशत सैंपलों में 'फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया' की पुष्टि हुई है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पीने के पानी में सीवेज या गंदा मल मिल रहा है।

63 में से 43 सैंपलों में मिला खतरनाक फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया

जल नमूनों की यह विशेष जांच मुख्य रूप से शहर के यूनियन कार्बाइड (यूका) कारखाने के आसपास के इलाकों में की गई थी। कुल 63 पानी के सैंपलों की जांच में से 43 सैंपल ऐसे थे जिनमें खतरनाक फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाया गया। यह परीक्षण 'तारा एक्वाचेक H2S वायल टेस्ट' विधि के जरिए किया गया। इस दौरान कुल 30 बस्तियों से पानी के नमूने जुटाए गए थे, जिनमें से 19 बस्तियों का पानी भारी संदूषण (contamination) की चपेट में पाया गया। गैस राहत से जुड़े स्थानीय संगठनों का कहना है कि इन बस्तियों में दूषित पानी के कारण जलजनित और गंभीर बीमारियों का खतरा तेजी से मंडराने लगा है।

तीन अलग-अलग जल स्रोतों से होती है पानी की आपूर्ति

जांच में यह तथ्य भी उजागर हुआ है कि प्रभावित क्षेत्रों में बड़े तालाब, कोलार और नर्मदा—इन तीनों अलग-अलग स्रोतों के माध्यम से पानी की सप्लाई की जाती है।

  • बड़े तालाब से लिए गए कुल 42 नमूनों में से 38 सैंपल दूषित निकले, यानी करीब 90 प्रतिशत पानी बेहद खराब स्थिति में है।

  • वहीं, कोलार सप्लाई से जुड़े 16 नमूनों में से 4 सैंपल दूषित पाए गए।

  • इस पूरी जांच के बीच एकमात्र राहत की खबर यह रही कि नर्मदा नदी की पाइपलाइन से लिए गए चारों नमूने पूरी तरह सुरक्षित और पीने योग्य पाए गए।

आठ साल बीत जाने के बाद भी हालात जस के तस

'भोपाल ग्रुप फॉर इंफॉर्मेशन एंड एक्शन' की सामाजिक कार्यकर्ता रचना ढींगरा ने इस गंभीर मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि नागरिकों को लगातार दूषित पानी सप्लाई करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और लापरवाह अमले की सख्त जवाबदेही तय होनी चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि नगर निगम ने वर्ष 2018 में अदालत के समक्ष शहर की सीवेज और पेयजल व्यवस्था में सुधार लाने का लिखित हलफनामा दिया था, लेकिन आठ साल का लंबा समय बीत जाने के बाद भी धरातल पर हालात में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आया है।

जलजनित बीमारियों की चपेट में आ सकती है एक लाख की आबादी

विभिन्न गैस पीड़ित संगठनों का कहना है कि इस तरह के जहरीले और दूषित पानी के सेवन से स्थानीय इलाकों में टाइफाइड, उल्टी-दस्त, गंभीर पेट के संक्रमण और पीलिया जैसी जलजनित बीमारियां तेजी से फैलने की आशंका है। उनका यह भी गंभीर आरोप है कि स्वास्थ्य विभागों के पास इन संक्रामक बीमारियों से पीड़ित मरीजों का कोई पुख्ता और अपडेटेड रिकॉर्ड तक उपलब्ध नहीं है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए गैस प्रभावित बस्तियों की लगभग 1 लाख से अधिक आबादी पर गंभीर बीमारियों का साया मंडरा रहा है।

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