दिल्ली की यमुना पर गंभीर सवाल, सुनीता नारायण बोलीं- नदी की हालत बेहद खराब

नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में यमुना नदी के कायाकल्प और सफाई के तमाम दावों के बीच सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की महानिदेशक सुनीता नारायण ने नदी की बदहाली पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि यमुना की स्थिति इस कदर चिंताजनक हो चुकी है कि इसे 'मृत' घोषित करना ही तार्किक होगा। उन्होंने वैज्ञानिक आंकड़ों का हवाला देते हुए खुलासा किया कि दिल्ली की सीमा में प्रवेश करते समय यमुना जल में घुलनशील ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) का स्तर लगभग 6 रहता है, किंतु आईएसबीटी (ISBT) तक पहुँचते-पहुँचते यह घटकर शून्य हो जाता है। इसी आधार पर उन्होंने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि 'यमुना मर चुकी है, बस उसका अंतिम संस्कार होना बाकी है।'
सुनीता नारायण ने यह वक्तव्य राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित '8वें इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन सस्टेनेबिलिटी एजुकेशन (ICSE) 2026' के मंच से दिया। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने दिल्ली में वायु और जल प्रदूषण के साथ-साथ वैश्विक जलवायु परिवर्तन के गंभीर दुष्परिणामों पर भी प्रकाश डाला।
पहाड़ों पर अंधाधुंध निर्माण और नेपाल त्रासदी का जिक्र
नेपाल में हाल ही में आई प्राकृतिक आपदा का संदर्भ देते हुए सुनीता नारायण ने कहा कि अब ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज को खारिज करना खुद को धोखे में रखने जैसा है। उन्होंने आगाह किया कि हिमालयी क्षेत्रों में अनियोजित अवसंरचनात्मक विकास, चौड़ी सड़कें और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स प्रकृति पर अत्यधिक दबाव बना रहे हैं। मानव समाज को यह भ्रम छोड़ना होगा कि नदियों और पर्वतों को अपनी सुविधानुसार बदला जा सकता है।
केवल इलेक्ट्रिक गाड़ियों से नहीं सुधरेगी दिल्ली की आबो-हवा
दिल्ली के बिगड़ते वायु गुणवत्ता सूचकांक पर चर्चा करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के प्रोत्साहन से प्रदूषण पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता। वास्तविक समाधान के लिए एक मजबूत और विश्वसनीय सार्वजनिक परिवहन ढांचा तैयार करना होगा, ताकि नागरिकों को व्यक्तिगत वाहन इस्तेमाल करने की आवश्यकता ही न पड़े।
पर्यावरण विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने जताई चिंता
संसाधनों के दोहन पर सवाल: 'टेरी' (TERI) की महानिदेशक डॉ. विभा धवन ने कहा कि पिछली पीढ़ियों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन का खामियाजा आज की युवा पीढ़ी भुगत रही है। उन्होंने बोतलबंद पानी और निजी गाड़ियों पर बढ़ती निर्भरता को रेखांकित किया।
व्यवहारिक पर्यावरण शिक्षा की मांग: सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एजुकेशन के संस्थापक निदेशक कार्तिकेय साराभाई ने विचार रखा कि पर्यावरण शिक्षा को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रखकर बच्चों में व्यावहारिक समाधान खोजने की क्षमता विकसित करनी चाहिए।
बहुविषयक दृष्टिकोण आवश्यक: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रो. राधिका खोसला ने प्रतिपादित किया कि जलवायु संकट से निपटने के लिए विभिन्न क्षेत्रों के समन्वित ज्ञान और व्यावहारिक सोच की दरकार है।
बच्चों पर बढ़ते खतरे: यूनिसेफ (UNICEF) के प्रतिनिधि बो बीस्कर (Bo Beiskjaer) ने भारत में भीषण गर्मी, बाढ़ और जल संकट से प्रभावित करोड़ों बच्चों की सुरक्षा के लिए स्कूलों में बुनियादी ढांचा मजबूत करने पर बल दिया।
तकनीक पर अति-निर्भरता से बचाव: कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रो. भास्कर वीरा ने कहा कि पर्यावरण शिक्षा का उद्देश्य न तो भय पैदा करना होना चाहिए और न ही यह भ्रम कि केवल आधुनिक तकनीक ही हर संकट का समाधान कर देगी।
