मां का ब्लड ग्रुप सीधे बच्चे के ब्लड ग्रुप को प्रभावित क्यों नहीं करता: शोध

नई दिल्ली । क्या आपने कभी सोचा है कि जब मां के शरीर से ही बच्चे को पोषण मिलता है, तो दोनों का ब्लड ग्रुप एक जैसा क्यों नहीं होता। एक अध्ययन के अनुसार इसका कारण गर्भ में मौजूद प्लेसेंटा और आनुवंशिक प्रक्रिया है, जो मां और शिशु के रक्त को अलग-अलग बनाए रखती है। विशेषज्ञों के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान मां का रक्त सीधे शिशु के शरीर में प्रवेश नहीं करता। मां और शिशु के बीच प्लेसेंटा नामक विशेष अंग एक सुरक्षा कवच और फिल्टर की तरह कार्य करता है। यह मां के रक्त से ऑक्सीजन, पोषक तत्व, हार्मोन और अन्य आवश्यक तत्व शिशु तक पहुंचाता है, लेकिन लाल रक्त कोशिकाओं (रेड ब्लड सेल्स) को सीधे शिशु के रक्त प्रवाह में जाने से रोकता है। चूंकि ब्लड ग्रुप का निर्धारण इन्हीं लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर मौजूद एंटीजन के आधार पर होता है, इसलिए मां का ब्लड ग्रुप सीधे बच्चे के ब्लड ग्रुप को प्रभावित नहीं करता। शिशु के अपने रक्त का निर्माण गर्भावस्था के दौरान ही शुरू हो जाता है।
शुरुआती चरण में लीवर और प्लीहा इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जबकि बाद में विकसित होने वाली अस्थि मज्जा (बोन मैरो) लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण करने लगती है। यही कारण है कि बच्चे का ब्लड ग्रुप उसके माता-पिता से मिले जीन के संयोजन के आधार पर तय होता है। उदाहरण के लिए यदि मां का ब्लड ग्रुप ‘ए’ और पिता का ‘बी’ है, तो बच्चे का ब्लड ग्रुप ‘ए’, ‘बी’, ‘एबी’ या ‘ओ’ में से कोई भी हो सकता है। इसी तरह आरएच (आरएस) फैक्टर भी आनुवंशिक रूप से निर्धारित होता है। यदि मां आरएच नेगेटिव और गर्भस्थ शिशु आरएच पॉजिटिव हो, तो कुछ परिस्थितियों में मां के शरीर में ऐसी एंटीबॉडी बन सकती हैं जो शिशु की लाल रक्त कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
 इस जोखिम को कम करने के लिए चिकित्सक आरएच नेगेटिव गर्भवती महिलाओं को समय पर एंटी-डी इंजेक्शन लगाने की सलाह देते हैं, जिससे भविष्य में होने वाली जटिलताओं से बचाव किया जा सके। चिकित्सकों का कहना है कि प्लेसेंटा केवल पोषण पहुंचाने का माध्यम नहीं, बल्कि मां और शिशु दोनों की सुरक्षा का महत्वपूर्ण अंग भी है। यही कारण है कि गर्भावस्था की शुरुआत में ही ब्लड ग्रुप और आरएच फैक्टर की जांच कराई जाती है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर समय रहते उचित उपचार किया जा सके। विशेषज्ञों के अनुसार बच्चे का ब्लड ग्रुप केवल मां से नहीं, बल्कि माता-पिता दोनों से मिले आनुवंशिक गुणों के आधार पर तय होता है। कई बार यह दादा-दादी या पूर्वजों से मिले जीन के कारण भी अलग दिखाई दे सकता है।

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