अद्भुत हैं ‘बम वाली’ देवी, मां के चमत्कार देख झुक गया था पाकिस्तानी सेना का ब्रिगेडियर

जैसलमेर. युद्ध की देवी, बम वाली माता, हिंगलाज माता, रूमाल वाली माता, आवड़ माता ये सब नाम उस विश्व प्रसिद्ध तनोट माता मंदिर के हैं, जिसने 1965 की जंग में पाक सेना को दिखाया था चमत्कार. आज हम आपको मां के उस रूप से रूबरू कराते हैं, जिस युद्ध देवी के चमत्कारों के सामने भारत ही नहीं, पाकिस्तान की फौज भी नतमस्तक है. 1971 में पाक सेना के ब्रिगेडियर शाहनवाज खान ने युद्ध समाप्ति के बाद भारत सरकार से माता के दर्शन की इजाजत मांगी. ढाई वर्ष बाद इजाजत मिलने पर शहनवाज खां ने तनोट माता के दर्शन कर मंदिर में चांदी का छत्र चढ़ाया.
मरुधरा में जैसलमेर जिला मुख्यालय से 130 किलोमीटर दूर भारत-पाकिस्तान सरहद पर उस मां का भव्य मंदिर है. यहां से पाकिस्तान बॉर्डर मात्र 20 किलोमीटर दूर है. भाटी राजपूतों की आराध्या का यही वह मंदिर है, जिस पर पाक ने 450 गोले दागे, लेकिन वे फटे ही नहीं. युद्ध की देवी के नाम से प्रसिद्ध इस माता के मंदिर के प्रताप से पाक को 1971 के युद्ध में भी मुंह की खानी पड़ी. यह देश का एकमात्र मंदिर है, जहां पूजा से लेकर भंडारे तक सारा प्रबंध सीमा सुरक्षा बल के पास है.
तनोट माता मंदिर का इतिहास
बहुत पहले मामडि़या नाम के एक चारण थे। उनकी कोई संतान नहीं थी. संतान प्राप्त करने की लालसा में उन्होंने हिंगलाज शक्तिपीठ की सात बार पैदल यात्रा की. हिंगलाज माता शक्तिपीठ वर्तमान में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के लासवेला जिले में स्थित है. एक बार माता ने स्वप्न में आकर उनकी इच्छा पूछी तो चारण ने कहा कि आप मेरे यहां जन्म लें. माता कि कृपा से चारण के यहां 7 पुत्रियों और एक पुत्र ने जन्म लिया। उन्हीं सात पुत्रियों में से एक आवड़ ने विक्रम संवत 808 में चारण के यहां जन्म लिया और अपने चमत्कार दिखाना शुरू किया. सातों पुत्रियां देवीय चमत्कारों से युक्त थीं. उन्होंने हूणों के आक्रमण से माड़ प्रदेश की रक्षा की.
भाटी राजपूतों की आराध्या
माड़ प्रदेश में आवड़ माता की कृपा से भाटी राजपूतों का सुदृढ़ राज्य स्थापित हो गया. भाटी राजपूत नरेश तणुराव भाटी ने इस स्थान को अपनी राजधानी बनाया और आवड़ माता को स्वर्ण सिंहासन भेंट किया. उन्होंने विक्रम संवत 828 में माता तनोट राय का मंदिर बनाकर मूर्ति को स्थापित किया था. कालांतर में भाटी राजपूत अपनी राजधानी तनोट से हटाकर जैसलमेर ले गए, परंतु मंदिर तनोट में ही रहा.
कई सालों बाद सातों बहनों ने तणुराव के पौत्र सिद्ध देवराज, चारणों, राजपूतों, ब्राह्मणों और माड़ प्रदेश के अन्य भक्तों को बुलाकर कहा कि अब सभी सुख-शांति से जीवन बिता रहे हैं. इसलिए अवतार लेने का उद्देश्य पूरा हुआ. इतना कहकर सभी बहनें पश्चिम में हिंगलाज माता की ओर देखते हुए अदृश्य हो गईं. पहले माता की पूजा साकल दीपी ब्राह्मण किया करते थे. 1965 से माता की पूजा सीसुब द्वारा नियुक्त पुजारी करते हैं.
मंदिर के बारे में दस फैक्ट जिनको जानना आपके लिए जरूरी है…
पाक ने बरसाए तीन हजार गोलेः भारत-पाक सीमा पर बने तनोट माता मंदिर में पाकिस्तानी गोलों के रूप में 1965 में हुए भारत-पाक युद्ध की यादेें आज भी मौजूं हैं. यह मंदिर भारत ही नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सेना के फौजियों के लिए भी आस्था का केन्द्र रहा है. 1965 के भारत पाक युद्ध से माता की कीर्ति और अधिक बढ़ गई, जब पाक सेना ने भारतीय सीमा के अन्दर भयानक बमबारी करके तीन हजार से अधिक हवाई और जमीनी गोले दागे, लेकिन तनोट माता की कृपा से अधिकांश गोले अपना लक्ष्य चूक गए.
तीन दिशाओं से तनोट को घेराः अगस्त 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हुआ। तनोट पर आक्रमण से पहले शत्रु (पाक) पूर्व में किशनगढ़ से 74 किमी दूर बुइली तक… पश्चिम में साधेवाला से शाहगढ़ और उत्तर में अछरी टीबा से 6 किमी दूर तक कब्जा कर चुका था. तनोट तीन दिशाओं से घिरा हुआ था. यदि शत्रु तनोट पर कब्जा कर लेता तो वह रामगढ़ से लेकर शाहगढ़ तक के इलाके पर अपना दावा कर सकता था. इसलिए तनोट पर अधिकार जमाना दोनों सेनाओं के लिए महत्वपूर्ण बन गया था.
दागे 450 गोले, एक भी नहीं फटाः पाकिस्तान ने तीन अलग-अलग दिशाओं से तनोट पर आक्रमण कर दिया. दुश्मन के तोपखाने जबर्दस्त आग उगलते रहे. तनोट की रक्षा के लिए मेजर जय सिंह की कमांड में 13 ग्रेनेडियर की एक कंपनी और सीमा सुरक्षा बल की दो कंपनियां दुश्मन की पूरी ब्रिगेड का सामना कर रही थीं. पाक ने जैसलमेर से तनोट जाने वाले मार्ग को घंटयाली देवी के मंदिर के समीप एंटी टैंक माइन्स लगाकर सप्लाई चैन को काट दिया. पाक ने तनोट मंदिर को निशाना बनाकर करीब 450 गोले दागे, लेकिन चमत्कारिक रूप से एक भी गोला निशाने पर नहीं लगा और मंदिर परिसर में गिरे गोलों में से एक भी नहीं फटा और मंदिर को खरोंच तक नहीं आई.
भारत-पाक युद्ध 1971 में दिखाया चमत्कारः 1971 के युद्ध में भी पाकिस्तान की सेना ने फिर हमला किया था, परन्तु 1965 की ही तरह उन्हें फिर से मुंह की खानी पड़ी. पाक सेना 4 किलोमीटर अंदर तक घुस आई थी, लेकिन युद्ध देवी के नाम से प्रसिद्ध तनोट माता के चमत्कार के कारण पाक सेना को न केवल उल्टे पांव लौटना पड़ा बल्कि अपने सौ से अधिक सैनिकों के शवों को भी छोड़कर भागना पड़ा. तनोट माता के बारे में कहा जाता है कि युद्ध के समय माता के प्रभाव ने पाकिस्तानी सेना को इस कदर उलझा दिया था कि रात के अंधेरे में पाक सेना अपने ही सैनिकों को भारतीय सैनिक समझकर उन पर गोलाबारी करने लगी.
लोंगेवाला विजय स्तम्भः दिसम्बर 1971 की रात को पंजाब रेजीमेंट की एक कंपनी और सीसुब की एक कंपनी ने माँ के आशीर्वाद से लोंगेवाला में बड़ी लड़ाई लड़ी. भारतीय रणबांकुरों ने पाकिस्तान की पूरी टैंक रेजीमेंट को धूल चटा दी थी. लोंगेवाला को पाकिस्तान टैंकों का कब्रिस्तान बना दिया था. लोंगेवाला विजय के बाद माता तनोट राय के परिसर में एक विजय स्तंभ का निर्माण किया, जहां हर वर्ष 16 दिसम्बर को महान सैनिकों की याद में उत्सव मनाया जाता है.
सारा प्रबंध बीएसएफ के हवालेः जैसलेमर में भारत-पाक सरहद पर लगभग 1200 साल पुराने तनोट माता के मंदिर के महत्व को देखते हुए सीमा सुरक्षा बल बीएसएफ ने यहां अपनी चौकी बना रखी है. यह प्रदेश का एकमात्र मंदिर है जहां पूजा, आरती, देखरेख और सारा प्रबंध भी बीएसएफ ही करती है. बीएसएफ द्वारा की जाने वाली आरती के समय मातृ भक्ति, देशभक्ति और धार्मिक भावना का अनूठा संगम देखने को मिलता है.
मंदिर में गोलों का संग्रहालयः भारत-पाक के बीच 65 और 71 में हुए युद्धों के दौरान पाकिस्तान की ओर जमकर गोलाबारी की गई. इन युद्धों के जिंदा सुबूत के तौर पर आज भी मंदिर परिसर में बने संग्रहालय में 450 गोले रखे हुए हैं, जो युद्ध के बाद मंदिर के पास की जमीन में दबे मिले थे. यहां आने वाले श्रद्धालु संग्रहालय में गोले को जरूर देखते हैं.
रुमाल बांधकर मांगते हैं मन्नतः तनोट माता को रुमाल वाली देवी के नाम से भी जाना जाता है. माता के प्रति प्रगाढ़ आस्था रखने वाले भक्त मंदिर में रुमाल बांधकर मन्नत मांगते हैं और मन्नत पूरी होने पर रुमाल खोलने आते हैं. यह माता के प्रति बढ़ती आस्था ही है कि दूर-दराज से हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पैदल यात्रा कर माता के दरबार में पहुंचते हैं और पैदल जाने वाले भक्तों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.
पाक ब्रिगेडियर ने चढ़ाया छत्रः तनोट राय माता की शक्ति को देखकर पाक सेना के ब्रिगेडियर शाहनवाज खान ने युद्ध समाप्ति के बाद भारत सरकार से माता के दर्शन की इजाजत मांगी. ढाई वर्ष बाद इजाजत मिलने पर शहनवाज खान ने तनोट माता के दर्शन कर मंदिर में चांदी का छत्र चढ़ाया. जो आज भी मंदिर में है.
साल में दो बार नवरात्र मेलाः हर वर्ष अश्विन और चैत्र नवरात्र में यहाँ विशाल मेले का आयोजन किया जाता है. अपनी दिनोंदिन बढ़ती प्रसिद्धि के कारण तनोट एक पर्यटन स्थल के रूप में भी प्रसिद्ध होता जा रहा है. नवरात्र पर साल में दो बार भरने वाले मेले में देशभर से हजारों की संख्या में भक्त तनोट माता के दर्शनार्थ पहुंचते हैं.
