वल्र्ड सेप्सिस डे पर डॉ. एस श्रीनाथ ने किया लोगों को सतर्क

भिलाई । दुनियाभर में प्रत्येक वर्ष 13 सितंबर को विश्व सेप्सिस दिवस मनाया जाता है। इस समस्या के कारण बढ़ती मृत्यु दर ने आज सेप्सिस को चिकित्सा जगत से जुड़े सभी प्रोफेशनल्स के लिए चिंता का विषय बना दिया है। जॉर्ज इंस्टीट्यूट ऑफ ग्लोबल हेल्थ के अनुसार भारत में सेप्सिस के कारण हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग जान गंवा बैठते हैं. यह संख्या स्तन कैंसर और प्रोस्टेट कैंसर दोनों को मिलाकर होने वाली मृत्यु की संख्या से भी अधिक है।
उक्त बातें स्पर्श मल्टी स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के चीफ इंटेंसीविस्ट विशेषज्ञ फिजिशियन डॉ. एस श्रीनाथ ने एक पत्रकारवार्ता में कही। डॉ. श्रीनाथ ने आगे बताया कि सेप्सिस के इसी खतरे के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए शहर में विश्व सेप्सिस दिवस के संदर्भ में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान उन्होंने कहा कि गंभीर संक्रमण की वजह से अंगों को होने वाली क्षति और इसके कारण होने वाली मौतों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। इसी स्थिति को सेप्सिस कहा जाता है. कमजोर इम्युनिटी वाले लोग जैसे कि बच्चे, बुजुर्ग तथा शराब का सेवन करने वाले या अनियंत्रित डायबीटीज के मरीज, कुपोषण के शिकार तथा क्रॉनिक किडनी डिसीज के मरीज, आदि पर इस समस्या का असर जल्दी और अधिक होता है. इसके अलावा वे मरीज जो डायलिसिस की प्रक्रिया से गुजर रहे होते हैं, किसी प्रकार के अंग प्रत्यारोपण या ऑर्गन ट्रांसप्लांट से गुजरे होते हैं या एंटी कैंसर दवाइयों का उपयोग कर रहे होते हैं, वे भी आसानी से इस समस्या का शिकार हो सकते हैं।Ó
डॉ. एस श्रीनाथ ने आगे कहा- 'कई बार अस्पताल में भर्ती किये गए मरीज, खासकर आईसीयू जैसी क्रिटिकल यूनिट्स में भर्ती किये जाने वाले लोगों पर हाइजीन की कमी के कारण हॉस्पिटल एक्वायर्ड इंफेक्शन (एचएआई) का असर हो जाता है जो सेप्सिस की स्थिति की ओर ले जा सकता है। उन मरीजों में भी यह चिंता का विषय हो सकता है जो किसी प्रकार की इनवेसिव डिवाइस, इंट्यूबेशन और मैकेनिकल वेंटिलेशन, मूत्र को शरीर से बाहर निकालने के लिए कैथेटर आदि का प्रयोग कर रहे होते हैं। ऐसे लोगों में इन डिवाइसों या साधनों की वजह से क्रमश: निमोनिया, ब्लड स्ट्रीम इंफेक्शन या यूटीआई यानी यूरीनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन आदि हो सकते हैं। इस स्थिति में हॉस्पिटल में संक्रमण के नियंत्रण के लिए रखी जाने वाली सावधानियों और अभ्यास का महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि ये सेप्सिस जैसी समस्या से बचाव कर सकती हैं। जैसे कि हैण्ड हाइजीन प्रैक्टिस, मेडिकेटेड सेंट्रल लाइंस का प्रयोग, शरीर से निकलने वाले स्राव को हटाने के लिए सक्शन पोर्ट के साथ एंडोट्रैकियल ट्यूब्स का प्रयोग, क्लोस्ड सिस्टम स्टेराइल फ्लुइड्स का प्रयोग आदि करना, ताकि मरीज को गंभीर संक्रमण होने से बचाया जा सके।
आज बैक्टीरिया के रजिस्टेंस पैटर्न और ताकत में होने वाली बढ़ोतरी पूरी दुनिया के सामने नई चुनौती है जिसके कारण एंटीबायोटिक्स का असर भी कम होता जा रहा है. ऐसे माइक्रोब्स या सूक्ष्म जीव जो एंटीबायोटिक्स प्रतिरोध को लेकर सुपरपावर विकसित कर लेते हैं, 'सुपरबग्सÓ कहलाते हैं। सुपरबग्स एक ऐसी दीवार खड़ी कर लेते हैं जिसको भेदकर एंटीबायोटिक्स शरीर के अंदर नहीं आ पाती। साथ ही इन सुपरबग्स के पास ऐसे एन्जाइम्स भी होते हैं जो शरीर के अंदर आने में कामयाब रही एंटीबयोटिक्स को खत्म कर देते हैं। वहीं कुछ सुपरबग्स में यह ताकत होती है कि वे एंटीबायोटिक्स को शरीर के लिए अनचाहा मेहमान समझकर उसे बाहर फेंकने की क्षमता भी रखते हैं. आमतौर पर हॉस्पिटल्स में पाए जाने वाले ये जीव आजकल समुदायों (लोगों के बीच) पाए जा रहे हैं। यह एक बड़ी चिंता का विषय है।
वर्तमान में भारत सरकार तथा भारतीय मेडिकल फ्रेटर्निटी एक साथ मिलकर सेप्सिस की घटनाओं को रोकने तथा इससे होने वाली मौतों की संख्या में कमी लाने की दिशा में काम कर रहे हैं. ऐसे अभियानों, कार्यक्रमों को असरदार बनाने के लिए बहुत जरूरी है कि मरीजों, उनकी देखभाल करने वालों और हॉस्पिटल स्टाफ के बीच जानकारी का प्रचार-प्रसार और तेजी से किया जाये। यह जरूरी है कि हम एंटीबायोटिक्स तभी खाएं जब बहुत आवश्यक हो और उतनी ही मात्रा में खाएं जितने डोज किसी योग्य एवं प्रशिक्षित डॉक्टर द्वारा प्रिस्क्राइब किये गए हों। साथ ही मन से लो पावर और हाई पावर एंटीबायटिक्स की भ्रान्ति को भी मिटायें, क्योंकि ऐसा कुछ भी नहीं होता।
डॉ. एस श्रीनाथ ने अपनी बात को समाप्त करते हुए कहा-Óइन सबके अलावा गंभीर संक्रमण से ग्रसित मरीजों के मामले में मंहगा इलाज और इससे जुड़े कॉम्प्लीकेशंस भी चिंता का विषय हैं। मनुष्य के जीवन को बचाने वाले डिस्पोजेबल उपभोग की वस्तुओं की कीमत, सुपरबग्स के लिए एंटीबायोटिक्स (रजिस्टेंट माइक्रोब्स), दवाइयां तथा अन्य सहयोगी साधन महंगे होंगे लेकिन ये किसी भी व्यक्ति की जान से अधिक कीमती नहीं हैं. इसलिए वक्त आने पर इनका प्रयोग तो करना हो होगा। लेकिन सेप्सिस के प्रबंधन के लिए 'प्रिवेंशन इज बेटर देन क्योरÓ (किसी बीमारी से बचाव के लिए किये जाने वाले उपाय इलाज से बेहतर होते हैं) ही आर्थिक रूप से सबसे फायदेमंद योजना है।
